नज़र

ये कहना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं
मशरूफ़ हैं हम मगर तुम्हें ख़बर नहीं।

3

थाम ज़रा

थाम ले इस पल को
अपनी गरीब सी हथेलियों में
खोल ज़रा जंगज़ा बाहें अपनी
दे न्योता उस आहट को
कह रही है तुझसे जो,
के थाम ज़रा
ये वक़्त, ये पल,
कह रहा है तुझसे
के थाम ज़रा।

भागती से सुईयाँ तेरे हाथों में,
इस जहाँ को समय बताती हैं;
मान ना उस बेईमान घड़ी की ये बातें
जिसकी क़ीमत तेरा वक़्त बताता है।
सुन तू सिर्फ अपनी आरज़ू की
वो कह रही है तुझसे
के थाम ज़रा
ये वक़्त, ये पल,
कह रहा है तुझसे
के थाम ज़रा।

कस ले आज उसे अपनी मुट्ठी में
जो है आज अधूरा सा तेरा;
थाम ले उस वक़्त को आज तू
जो है आज अधूरा सा तेरा

ये वक़्त, ये पल,
कह रहा है तुझसे
के थाम ज़रा।

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P.S. I am super happy to announce Shubham Uprit as a contributor on Banjara! His poems are going to be hosted on this blog from time to time. The above poem is his debut poem for Banjara. *Happyness*

Aayushi

Airport

The sweet anticipation
of waiting for you at the airport.
The sweet realization
that my happiness
is going to walk out of the door
any moment.
How can anything be better?

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Maybe

So precious,
the moments of togetherness
Somehow I feel
We live for those moments.
Waiting and wanting
each day, day after day…
What more than the little hope
of something wonderful
to come our way someday?
What more than the sweet dreams
of love and care and joy
to become our reality someday?

Maybe each day we’re a little closer than we were before.

So we need such hopes.
So we need such dreams.

Oh dear.

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