नज़र

ये कहना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं
मशरूफ़ हैं हम मगर तुम्हें ख़बर नहीं।

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थाम ज़रा

थाम ले इस पल को
अपनी गरीब सी हथेलियों में
खोल ज़रा जंगज़ा बाहें अपनी
दे न्योता उस आहट को
कह रही है तुझसे जो,
के थाम ज़रा
ये वक़्त, ये पल,
कह रहा है तुझसे
के थाम ज़रा।

भागती से सुईयाँ तेरे हाथों में,
इस जहाँ को समय बताती हैं;
मान ना उस बेईमान घड़ी की ये बातें
जिसकी क़ीमत तेरा वक़्त बताता है।
सुन तू सिर्फ अपनी आरज़ू की
वो कह रही है तुझसे
के थाम ज़रा
ये वक़्त, ये पल,
कह रहा है तुझसे
के थाम ज़रा।

कस ले आज उसे अपनी मुट्ठी में
जो है आज अधूरा सा तेरा;
थाम ले उस वक़्त को आज तू
जो है आज अधूरा सा तेरा

ये वक़्त, ये पल,
कह रहा है तुझसे
के थाम ज़रा।

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P.S. I am super happy to announce Shubham Uprit as a contributor on Banjara! His poems are going to be hosted on this blog from time to time. The above poem is his debut poem for Banjara. *Happyness*

Aayushi